सार :

मध्य प्रदेश भारत का हृदय प्रदेश माना जाता है। यह सभी प्राकृतिक और ऐतिहासिक संपदायो से समृद्ध है। चाहे वह सर्वाधिक वन प्रदेश हो, ऐतिहासिक धरोहर हो; या वन्य प्राणी आदि। यहां का इतिहास पाषाण कालीन माना जाता है। यह पहचान प्रदेश में मिले इतिहास के उन पदचिन्हों से मानी जाती है जो भीमबेठिका समेत प्रदेश के कई हिस्सों में देखे गए हैं, ऐसे ही एक और ऐतिहासिक और विवादों से घिरे स्थल के बारे में हम इस लेख में जानेंगे।

विस्तार :

मध्य प्रदेश का इतिहास, साहित्य और संस्कृति किसी से छिपी नहीं है, यहां ऐसे कई स्थल हैं जिनसे विश्व में भारत की पहचान होती है। हर क्षेत्र में समृद्ध भारत का यह हृदय प्रदेश कई विशाल मंदिरों, ऐतिहासिक स्मारकों, किलों, पाषाण कालीन साक्ष्य से विश्व में अपनी पहचान बना चुका है। आज भी प्रदेश में कई ऐसे स्थान हैं जो लोगों की नजरों में आने से बचे हैं तो कुछ स्थलों को वो पहचान नहीं मिल सकी जिनके वह हकदार हैं तो कुछ स्थल आज भी विवादों का विषय बने हुए हैं। ऐसा ही स्थान हैं प्रदेश के विदिशा जिले में स्थित बीजामंडल।कभी भारत के भव्य और विशाल मंदिरों में गिना जाने वाला मध्य प्रदेश विदिशा का यह स्थान “बीजामंडल” विजय मंदिर के नाम से जाना जाता था।

मध्य प्रदेश विदिशा “बीजामंडल” का इतिहास :

बीजामंडल विशाल मंदिर

भारत के हृदय प्रदेश मध्य प्रदेश के विदिशा शहर में बीजामंडल स्थित है, इस प्रसिद्ध बीजामंडल को कभी विजय मंदिर और चर्चिका देवी मंदिर के नाम से भी जाना जाता था। समय बदलता गया शासक बदलते गए और साथ ही बदलता गया इसका नाम; आज इसे हम बीजामंडल कहते हैं। यह एक प्रसिद्ध ऐतिहासिक और पुरातात्विक स्थल हैं जो कभी बड़ा ही विशाल हुआ करता था। अध्य्यन से पता चलता है कि यह मंदिर एक विशाल परिसर में फैला करीब खजुराहों के कंदिरा मंदिर से भी विशाल था। अगर हम इसके इतिहास की बात करें तो इसका ऐतिहासिक महत्व बहुत ज्यादा समझ आता है। इस विशाल और सुंदर मंदिर का निर्माण 8वीं-11वीं शताब्दी में चालुक्य और परमार राजाओं के शासनकाल में करवाया गया था। जानकारी के लिए बताना उचित होगा कि उस समय यह मंदिर भारत का एक महत्त्वपूर्ण और भव्य मंदिर माना जाता था। परमार और चालुक्य राजाओं के बाद जब मुगल सल्तनत का भारत पर आक्रमण हुआ तब मुगल बादशाह औरंगजेब के काल (1658-1707 ईस्वी) में, औरंगजेब ने इस विशाल मंदिर को तुड़वा दिया और ध्वस्त अवशेषों पर एक मस्जिद बनवा दी गई, जिसका नाम लगभग (1682) में”आलमगीर मस्जिद” रखा गया। मस्जिद के निर्माण के बाद कई वर्षों तक मुसलमान इस मस्जिद में नमाज़ अदा करते रहे। वर्तमान में यह परिसर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के संरक्षण में है।

उच्च कोटि की कारीगरी और नक्काशी स्वयं कहती है इसकी कहानी :

बारीक नक्काशी

इस मंदिर में बहुत ही उच्च दर्जे की बारीक कारीगरी देखी जा सकती है। इसकी सुंदरता और विशालता इस मंदिर के समय की कहानी स्वयं कहती है। इस मंदिर की बनावट अत्यधिक रोचक है, इस प्राचीन विजय मंदिर का स्थापत्य और आधार काफी हद तक आधुनिक नए संसद भवन के जैसा है। बेहद ही खूबसूरत और आकर्षक नक्काशी, रहस्यमई बावड़ी यहां देखी जा सकती है। वर्तमान समय में यह पुरातत्त्व विभाग के संरक्षण में है यहां संग्रहालय में इस मंदिर के कई साक्ष्य संभाल कर रखे गए हैं। यहां खुदाई से प्राप्त मूर्तियां स्वयं ही किसी विशाल शासनकाल की गाथा कहती हैं। अपने मूल रूप में यह मंदिर इतना भव्य और विशाल था कि इसकी तुलना खजुराहो के मंदिरों से की जाती थी। एक शिलालेख के अनुसार, यह मंदिर मीलों दूर से दिखाई देता था। यहां नक्काशीदार स्तंभ और संस्कृत शिलालेख मिले हैं, जो इसके हिंदू मंदिर होने के प्रबल प्रमाण देते हैं। यह मंदिर अभी पूरी तरह से खोदा नहीं गया है, लेकिन इसकी लंबाई लगभग 34.60 मीटर आंकी गई है। यहां मानव, मगर और शेरों की मुखकृर्तियां को उकेरकर कई तरह की नक्काशी की गई थी। बीजा मंडल के दक्षिणी भाग के एक पुराने समय की चौखट भी मिली है। वर्तमान में इसे अच्छी तरह विकसित किया गया है मंदिर के आसपास बगीचा और एक पुरानी बावड़ी दर्शको को ख़ूब भाती है।

विवादों से घिरा यह सुंदर स्थल आज भी बेड़ियों में :

बेड़ियों में बंद मंदिर में रखे हजारों शिवलिंग

इतिहास के पन्नो में इस विशाल मंदिर की कहानी दर्ज़ है। किसी समय जिसकी सुंदरता, विशालता के चर्चे पूरे भारत में हुआ करते थे जिसकी अपनी अलग ही पहचान थी, मुगल शासकों के आते ही वह खत्म कर दी गई। इस प्रसिद्ध मंदिर की पहचान खो गई या कहें की छुपा दी गई, जहां तक की इस मंदिर के पास रह रहे लोगों को भी इसका अंदाजा नहीं था। इस मंदिर के दुबारा लोगों की नजरों में आने की कहानी बेहद ही रोचक है। जहां लोग इसे अभी तक एक मस्जिद समझ रहे थे उसका इतिहास अचानक सामने आया। अध्ययनों में बताया गया है कि सन 1991 में एक रात शहर में तेज़ आंधी तूफान के साथ जोरदार बारिश हुई जिससे इस मंदिर पर बनवाई गई मस्जिद की दीवार गिरकर टूट गई। टूटी हुई दीवार जब अंदर धसी तब इसके अंदर का 300 वर्षों से दफन इतिहास भी सामने आ गया। मस्जिद के अंदर 300 वर्षों से अधिक समय से दफन की गई हिंदू मूर्तियाँ बाहर आ गईं। तब यह लोगों की नजरों में आया कि यहां मस्जिद नहीं मंदिर हुआ करता था।

तत्काल पुरातत्व विभाग को सूचित किया गया और शुरू हुई इसके इतिहास की खुदाई। जब भारतीय पुरातत्त्व विभाग द्वारा इसकी खुदाई की गई तब कई हिंदू देवी देवताओं की मूर्तियां यहां से निकाली गई जो एक चबूतरे के नीचे दबाई गईं थीं। अध्ययनों से पता चलता है कि एक बार पहले भी सन 1972-73 में इस मंदिर की खुदाई का कार्य उस समय के कलेक्टर द्धारा शुरू करवाया गया था। उस समय हिंदू देवी और भगवान गणेश की मूर्तियों की भी पुष्टि हुई थी। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के उस अधिकारी के इस शोध पर रोक लगा दी गई। परिणामस्वरूप, उस समय के शहर के कलेक्टर की बदली कर दी गई क्योंकि पूरी जांच चल रही थी और यह केवल उनके आदेश पर ही किया गया था। खुदाई में जब हिन्दू धर्म से संबंधित देवी देवताओं की मूर्तियां मिली तब सरकार ने हिंदू और मुस्लिमों के बीच किसी भी तरह के दंगे को रोकने के लिए यह रोक लगाई थी। इसीलिए आज भी इस भव्य मंदिर को बेड़ियों में बंद किया गया है। हिंदू संगठनों का दावा है कि खुदाई में यहां 1500 से अधिक मूर्तियां और शिवलिंग प्राप्त हुए हैं। वे इस स्थल को हिंदुओं को सौंपने और इसे पूर्ण रूप से पूजा के लिए खोलने की मांग को लेकर हाईकोर्ट में कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं।

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