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सारः

विश्व के सबसे बड़े आयोजन महाकुंभ का प्रारंभ और श्रीगणेश आज से हो चुका है। जिसके लिए पहला अमृत स्नान कल यानी मकर सक्रांति को होगा। आज से सनातन धर्म के सबसे बड़े कुंभ कहा शुरुआत हो चुकी है जिसमें करोड़ों सनातनी भक्त आना शुरू होगए हैं| बता दें कि इस महाकुंभ का कल्पवास स्नान 12 फ़रवरी को माघ पूर्णिमा के दिन होगा वहीं कुम्भ का अंतिम स्नान 26 फ़रवरी को होगा।

विस्तारः

इस विश्व के सबसे बड़े धार्मिक आयोजन यानी महाकुंभ का श्रीगणेश सोमवार यानी आज से गंगा यमुना और अदृश्य या लुप्त हुई सरस्वती के तट पर प्रयागराज में होने जा रहा है पौष पूर्णिमा के स्नान के साथ श्रद्धालु कल्पवास शुरू करेंगे इस बार 10, लाख से ज़्यादा श्रद्धालुओं के कल्पवास का अनुमान है कल्पवास 12 फ़रवरी को माघ पूर्णिमा के इस महान के साथ समाप्त होगा। इस महाकुंभ हो या की मान्यता है और सनातन धर्म में इस आयोजन की लोकप्रियता वर्षों से चली आ रही है। इस बार पूरे 12 वर्ष के बाद प्रयागराज में महाकुंभ का आयोजन किया जा रहा है 12 वर्ष पर होने वाले कुंभ का पहला अमृत स्नान मंगलवार को मकर सक्रांति के दिन होगा बता दें कि इसमें सभी अखाड़े भव्यता के साथ संगम में डुबकी लगाएंगे। जहाँ इस महाकुंभ का प्रारम्भ आज से हो चुका है तो वहीं इस महाकुंभ का अंतिम स्नान 26 फ़रवरी को होगा। सनातन धर्म के इस सबसे बड़े पर्व पर देश से ही नहीं बल्कि विदेशों से भी भक्त और सनातनी इस महाकुंभ में स्नान के लिए और इस आयोजन का हिस्सा बनने के लिए आते हैं।

कुंभ स्नान की मान्यता; नष्ट होंगे जन्म जन्मांतर के पापः

हज़ारों वर्षों से महाकुंभ और कुंभ मेले की ख़ूब मान्यता रही है सनातनी धर्मी के जीवन में महाकुंभ और कॉम्बो का बहुत महत्व है हर सनातन धर्मी के जीवन में 2 चीज़ें है एक पुण्य और दूसरा पाप, पुण्य से सुख मिलते हैं और इंसान सुख भोगता है तो वहीं पाप कर्मों से दुख भोगना पड़ता है इसलिए वह पाप मिटाने और पुण्य अर्जित करने के लिए प्रयास करते रहते हैं पुण्य कि इस आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए महा पर्व कुम्भ माना जाता है।माना जाता है कि कुंभ एक ज़रिया है जिसके द्वारा मनुष्य अपने धर्मो को संजो सकता है और अपने पापों को नष्ट करने के लिए वह कुंभ का हिस्सा बन सकता है संगम में डुबकी लगाने से जन्म जन्मांतर के पाप नष्ट होते हैं ये अवसर भविष्य में ग़लत करने से बचने का संकल्प लेने का भी होता है। ऐसा नहीं है कि आप पुण्य की जगह पाप करते जाएं और कुंभ में स्नान से वह पाप धुल जाएंगे। कुंभ में स्नान करना इसका प्रमाण भी है कि आगे जाकर हम पिछले जो भी गलती या अज्ञानतावश जो दुष्कर्म हुए हैं उनकी छमाह याचना करते हैं और आगे कोई भी इस तरह की गलती न करने का संकल्प लेते हैं। ये है ऋषि मुनियों की कही गई अनुभूति वाते हैं सामान्य स्नान शरीर का मैल धोने के लिए होता है पर तीर्थों पवित्र इस नानो ओह कहा इस महान मन का मैल धोने के लिए होता है इसलिए कुंभ इस महान पुणे के संकल्प और पूरी श्रद्धा के साथ करना चाहिए।

क्यों मानी जाती है कुंभ और महाकुंभ मेले की मान्यताः

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करोड़ों साल पहले देव और दानवों संघर्ष से निकले अमृत कुंभ को जागृत करने का महापर्व ही ई कॉमर्स कहलाता है और यह महापर्व इस बार प्रयागराज में है प्रयागराज में वैसे तो हर वर्ष एक महीने का माघ मेला होता है जिसमें हज़ारों कल्पवासी और साधु संत आते हैं पर हर छठे वर्ष अर्धकुंभ और बारहवें वर्ष पर कुंभ में गंगा यमुना और अदृश्य सरस्वती की त्रिवेणी की छटा दुती ही होती है। प्रयागराज उन चार शहरों में से एक है जहाँ हर बारह वर्ष पर कुंभ का आयोजन होता है कुंभ का संदर्भ पुराणों में मिलता है कहते हैं की समुद्र मंथन के समय भगवान धनवंतरी जब अमृत कलश लेकर प्रकट हुए तो देव और दानव दोनों ही ख़ुशी से झूम उठे और इन दोनों समूहों में होड़ मच गई कि कोहली पहले अमरत्व प्राप्त करेगा भगवान विष्णु ने अमृत को दानवों से बचाने के लिए देवराज इन्द्र के पुत्र जयंत को संकेत दिया कि वह कुंभ लेकर अथवा अमृत कलश लेकर देवलोक की ओर उड़ चले लेकिन दानवों के गुरु शुक्राचार्य ने उन्हें देख लिया देखते ही देखते हैं देव दानवों में युद्ध छिड़ गया अंत में देवता अमृत कलश बचाए रखने में सफल हो सके लेकिन इस इस दौरान देवलोक में आठ और पृथ्वी लोक में चार स्थानों पर अमृत की बूंदें छलक पड़े पृथ्वी पर अमृत कि ये बूँदें प्रयाग और हरिद्वार में प्रवाहमान गंगा नदी, उज्जैन की शिप्रा और नासिक की गोदावरी नदी में गिरी; बस तभी से चारों स्थानों में अमृत कुंभ जाग्रत करने की परंपरा शुरू हो गई यह देव दानव संघर्ष बार अमानवीय वर्ष तक चलता रहा कहते हैं इसलिए ये नदी तटों पर हर 12 साल पर कुम्भ मेला का आयोजन किया जाता है।

कुम्में में ग्रहों की स्थिति भी अहम मानी जाती है; अमृत के लिए जवाबदेह और दानवों में संघर्ष चल रहा था तो अमृत कलश की सुरक्षा का दायित्व चार ग्रहों पर भी था जिनमें बृहस्पति, चंद्रमाँ,सूर्य और शनि का भी योगदान माना जाता है चंद्रमा को अमृत गिरने से बृहस्पति को उसे दानवों से सनी को देवताओं वाह सूरज को कोमल टूटने से बचाना था इसलिए कुंभ में इन रहूँ की विशेष स्थिति होती है पिछला कुंभ2021 में हरिद्वार में हुआ था प्रयागराज कुंभ के बाद अब अगला कुंभ 2028 में उज्जैन में होगा।

चार अलग अलग स्थितियों में चार जगह कुंभ का आयोजनः

सनातन धर्म की मान्यताओं के अनुसार तीन तरह के खंभों की मान्यताएं है जिसमें तीन वर्ष में कुंभ छः वर्षों में अर्धकुंभ और बारह वर्ष में महाकुंभ का आयोजन किया जाता है। इन महापर्व में आने वाली आलौकिकत्ता से अभिभूत हो जाते हैं आदि गुरु शंकराचार्य ने छठी शताब्दी ईसापूर्व जब कुंभ को लोकप्रिय बनाया तब कोई नहीं समझ सका था की अनवरत चलने वाली ऐसी सनातन यात्रा प्रारंभ हो रही है।

प्रयागराज कुंभः

प्रयागराज कुंभ का आयोजन तब होता है जब बृहस्पति ग्रह ब्रश अब रस्सी में और सूर्य मकर राशि में हो तब गंगा यमुना व अदृश्य सरस्वती के संगम पर एवं में नदी के किनारे कुंभ का आयोजन किया जाता है।

हरिद्वार कुंभः

बृहस्पति ग्रह कुम्भ राशि में हो और सूर्य मेष राशि में गोचर करें तो गंगा किनारे इस हरिद्वार कुंभ का आयोजन किया जाता है।

नासिक कुंभ

नासिक कुंभ का आयोजन तब होता है जब बृहस्पति ग्रह के साथ सूर्य सिंह राशि में हो और इस कुंभ का आयोजन गोदावरी नदी के तट पर किया जाता है।

उज्जैन कुंभ

उज्जैन कुंभ का आयोजन तब होता है जब बृहस्पति सिंह राशि और सूर्य मेष राशि में प्रवेश करते हैं भगवान महाकाल की नगरी उज्जैन में क्षिप्रा नदी के तट पर इस कुंभ का आयोजन किया जाता है।

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