हाल के वर्षों में कानून में हुई प्रगति और व्यक्तिगत अधिकारों के गहरे होते अर्थ को देखते हुए व्यापक रूप से यह उम्मीद की गई थी की पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ विशेष विवाह अधिनियम की लिंग निरपेक्ष व्याख्या करेगी ताकि समान लिंग के लोगों को इसमें शामिल किया जा सके। सुप्रीम कोर्ट का समान लिंग के व्यक्तियों के बीच शादी को कानूनी मान्यता देने से इनकार करना देश के समलैंगिक समुदाय के लिए बाद कानूनी धक्का है। अतः सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने से इनकार कर दिया है।

पीठ ने समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने और बच्चा गोद लेने के अधिकार पर कल फैसला सुनाया हैं। समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता को सबने नकार दिया है हालांकि गोद लेने की मसले पर तीन:दो का बहुमत का फैसला हुआ है। 366 पेज के फैसले में पीठ ने कहा कि समलैंगिक समुदाय के विवाह को कानूनी मान्यता देने का काम संसद का है केंद्रीय कानून की गैर मौजूदगी में राज्य अपने कानून बनाने के लिए स्वतंत्र है हालांकि पीठ ने कहा कि समलैंगिक को दिए जा सकने वाले अधिकारों और लबों की पहचान के लिए कैबिनेट सचिव की अध्यक्षता वाला पैनल बने।

भारत के प्रधान न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ और जस्टिस संजय किशन कॉल ने फैसला दिया है कि समलैंगिक जोड़ों को अपने मिलन के लिए मान्यता हासिल करने का अधिकार है लेकिन साथ ही विशेष विवाह अधिनियम के उस आशय के प्रावधानों में कांट छांट करने रेड डाउन से इनकार कर दिया है दूसरी तरफ न्याय मूर्ति एस रवींद्र भट्ट, हिमा कोहली और स नरसिंहl ने इस नजरिए को खारिज किया है और कहा है कि कोई भी ऐसी मान्यता विधायिका द्वारा बनाए गए कानून पर ही आधारित हो सकती है यानी अदालत में सरकार के इस दृष्टिकोण को स्वीकार किया है कि समलैंगिक शादियों को कानूनी बताने का कोई भी काम विधायकों के अधिकार क्षेत्र में आएगा।

जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि समलैंगिकता शहरों तक ही सीमित नहीं है समलैंगिक गांव में भी हो सकते हैं शहर में अंग्रेजी बोलने वाला पुरुष समलैंगिक होने का दावा कर सकता है वही गांव में खेत में काम करने वाली महिला भी ऐसा दावा कर सकती है। संविधान के अनुच्छेद 245 और 246 के तहत संसद ने विवाह संस्था में बदलाव लाने वाले कई कानून बनाए हैं याचिकाकर्ता चाहते हैं की स्पेशल मैरिज एक्ट में सुधार कर समलैंगिकों के विवाह को कानूनी मान्यता दी जाए, इस संदर्भ में कानून बनाने का काम संसद का है और कोर्ट को इसमें दखल नहीं देना चाहिए।

उन्होंने यह भी कहा कि विवाह मौलिक अधिकार नहीं है हम स्पेशल मैरिज एक्ट की धारा 4 को असंवैधानिक मानते हैं तो प्रगतिशील कानून का उद्देश्य खत्म हो जाएगा।

सुप्रीम निर्देश:

  • * मौजूदा कानून में ट्रांसजेंडर को शादी करने का अधिकार है उन्हें इसे रोक नहीं जा सकता यदि कोई ट्रांसजेंडर विषम लिंगी व्यक्ति से शादी करना चाहता है तो कानून में ऐसी शादी को मानता दी जाएगी क्योंकि एक पुरुष होगा और एक महिला।
  • * केंद्र सरकार और राज्य सरकार सुनिश्चित करें कि समलैंगिकों से भेदभाव ना हो लोगों को जागरूक किया जाए ताकि इनका उत्पत्ति पिद्दन रुक उत्पीड़न रुक रुक।
  • * समलैंगिक जोड़ा पुलिस में शिकायत करें तो सत्यापन के बाद उसे उचित सुरक्षा मिलनी चाहिए।
  • * समलैंगिक के राशन कार्ड में उनकी पहचान जॉइंट बैंक खाते बीमा और पेंशन लाभ देने के लिए सरकार को कदम उठाना चाहिए।
  • * समलैंगिक व्यक्ति को जन्मजात परिवारों के दबाव से मुक्ति का भी अधिकार है इनके किसी पर सदस्य के खिलाफ परिवार हिंसा करता है तो पुलिस उचित संरक्षण दें।
  • * केंद्र व राज्य सरकारी सरकारी राज्य की योजनाओं का लाभ उठाने के लिए समलैंगिक लोगों को भी शामिल करें।

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