हाल ही में मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव निपटे हैं जिसमें प्रदेश में लंबे समय से मुख्यमंत्री रही शिवराज सरकार ने अपनी एड़ी चोटी का जोर लगाकर मध्य प्रदेश की जनता को भाजपा की ओर लुभाया और वह इसमे सफल भी रहे। विधानसभा चुनाव 2023 में मध्य प्रदेश में भाजपा ने पूर्ण बहुमत हासिल कर यह चुनाव जीत लिए। पहले लोगों को मध्य प्रदेश की जनता को यह लग रहा था की मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री की कमान शिवराज सिंह चौहान के हाथों में ही होगी लेकिन भाजपा ने इस मुद्दे से पर्दाफाश नहीं किया था। और लोगों और प्रदेश की जनता के सामने अब यह सवाल खड़ा हो गया था कि प्रदेश का नया मुख्यमंत्री कौन होगा।
जिसका ऐलान भाजपा सरकार ने आज यानि सोमवार को भोपाल में हुई बैठक में कर दिया है। सभी बड़े नेताओं ने मध्य प्रदेश के उज्जैन दक्षिण विधानसभा क्षेत्र के विधायक मोहन यादव को मध्य प्रदेश का नया मुख्यमंत्री चुन लिया है। जिसके चलते पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का कार्यकाल यही समाप्त हो चुका है और उन्होंने मध्य प्रदेश के राज्यपाल मंगुभाई पटेल को अपना इस्तीफा सौंप दिया है। अतः अब शिवराज सिंह चौहान मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री नहीं रहे उन्होंने राज्यपाल को इस्तीफा सोपते हुए नए सीएम मोहन यादव को बधाइयां दी।
शिवराज सिंह चौहान ने काफी लंबे समय मध्य प्रदेश में किया राज:-
सोमवार को भाजपा विधायक दल की बैठक में मोहन यादव को मध्य प्रदेश का मुख्यमंत्री चुन लिया गया। 17 साल में ऐसा पहली बार हुआ है जब भाजपा ने मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री का चेहरा बदल दिया है। पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान चार बार मुख्यमंत्री रह चुके हैं यानी सबसे लंबे कार्यकाल वाले पहली बार शिवराज 2005 में मुख्यमंत्री बने थे और 2018 तक पद पर बने रहे 2018 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को बहुमत नहीं मिला लेकिन मार्च 2020 में ज्योतिरादित्य सिंधिया के अपने पार्टी के कुछ नेताओं को लेकर बीजेपी में मिल जाने की वजह से कांग्रेस सरकार गिर गई और दोबारा भाजपा को अपनी सरकार बनाने का मौका मिला शिवराज फिर से चौथी बार मुख्यमंत्री बन गए थे देखा जाए तो बतौर मुख्यमंत्री शिवराज का कार्यकाल लगभग 17 साल का रहा है।
बता दे की पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इस बात के संकेत पहले भी दे दिए थे कि वह इस बार मुख्यमंत्री की रेस से बाहर है। उन्होंने राघोगढ़ की एक सभा में कहा था की मामा और भैया को जो पद है वह दुनिया में किसी भी पद से बड़ा है इससे बड़ा कोई पद नहीं है। अगर शिवराज सिंह चौहान के जीवन की कुछ पिछली यादों को दोहराया जाए तो 1972 में मात्र 13 साल की उम्र में श्री शिवराज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ गए थे फिर एबीबीपी में आ गए। इमरजेंसी के दौरान शिवराज कुछ समय के लिए जेल भी गए थे एक तरह से देखा जाए तो उनकी राजनीति को 50 साल से ज्यादा का समय हो चुका है।
1988 में शिवराज भाजपा युवा मोर्चा के अध्यक्ष बने साल 1990 में शिवराज ने बुदनी सीट से अपना पहला विधानसभा चुनाव लड़ा। बताया जाता है कि शिवराज सिंह चौहान ने पूरे इलाके की पदयात्रा की और पहले ही चुनाव जीत लिया था अगले ही साल लोकसभा चुनाव हुए भाजपा के अटल बिहारी वाजपेई ने दो सीट विदिशा और लखनऊ से चुनाव लड़ा चुनाव जीतने के बाद उन्होंने विदिशा सीट छोड़ दी। अटल बिहारी वाजपेई के सीट छोड़ने पर शिवराज को विदिशा से लड़वाया गया शिवराज यहां से भी जीत गए इसके बाद शिवराज ने यहीं से 1996, 1998, 1999 और 2004 में भी लोकसभा चुनाव जीता। इस बीच 2003 में हुए एमपी विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने शिवराज सिंह चौहान को दिग्विजय सिंह के खिलाफ राघोगढ़ से उतारा उस चुनाव में बीजेपी से उमा भारती सीएम का चेहरा थी। शिवराज हार गए शिवराज के राजनीतिक कैरियर की यह पहली और इकलौती हार थी।
अचानक बने मुख्यमंत्री:-
2003 में बीजेपी चुनाव जीती उमा भारती सी एम बनी लेकिन उनके सीएम बनना पार्टी के लिए आशा भर रहा उमा भारती के विवादित बयानों से आलाकमान नाराज था। इस बीच 1994 में हुए हुबली दंगों के सिलसिले में उमा भारती के खिलाफ अरेस्ट वारंट जारी हो गया। इस कारण 8 महीने में ही उन्हें मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा। उमा भारती के बाद भाजपा ने बाबूलाल गौर को मुख्यमंत्री बनाया लेकिन बाबूलाल गौर के खिलाफ पार्टी में बगावत हो गई पार्टी ने इस बीच नया चेहरा तलाश और आखिरकार 29 नवंबर 2005 को शिवराज को मुख्यमंत्री बनाया गया।
शिवराज सिंह चौहान को जब सीएम के लिए चुना गया तब वह लोकसभा के सांसद थे। जिस समय पार्टी बाबूलाल गौर की जगह नए सीएम को लेकर मंथन कर रही थी तब भी शिवराज सिंह चौहान का नाम दूर-दूर तक नहीं था। प्रमोद महाजन ने शिवराज के नाम का प्रस्ताव रखा और तात्कालिक बीजेपी अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी ने उन्हें चुनकर सबको चौंका दिया। इस तरह से सीएम के पद पर शिवराज सिंह का चुनाव हो गया।
