मां दुर्गा की पूजा को शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता। यह एक ऐसी भावना और ऐसा एहसास है ऐसी पूजन विधियां हैं जिसे जिया जाए तो समझा जा सकता है। पंडालो में स्थापित मां दुर्गा की प्रतिमाएं भव्यता के दुर्लभ दर्शन कराती हैं रोशनी ध्वनि और रंग का ऐसा मेल की दर्शनीयता बढ़ जाती है और दर्शनार्थ ठगासा देखा जा रह जाता है। केवल देवी पंडालों में ही देखने को मिलती है ऐसी भव्यता। उपासक अपने-अपने तरीके से और अपने क्षेत्र के अनुसार रीति-रिवाज को करते हुए मां अंबे की उपासना आराधना करते हैं इन दिनों गुजरात में लोग चलते भी लय में है। गुजरात के लोग इस समय गरबे का अभ्यास और नृत्य करके देवी को खुश करते हैं। बंगाल के लोग कंlस के फूलों से जान जाते हैं कि दुर्गा आने वाली है किस तरह हर क्षेत्र में लोग अपनी परंपराओं और नियमों द्वारा मां अंबे की पूजा आराधना करते हैं। इस तरह देवी की आराधना सब अपने रीति रिवाज से करते हैं ऐसे में अगर कुछ खास तरीके अपनाए तो देवी की आराधना का माहौल और भी धार्मिक हो जाता है।
15 अक्टूबर यानी आज से मां अंबे की आराधना के महापर्व नवरात्रि का प्रारंभ हो चुका है इसके लिए जगह-जगह बड़े स्तर पर तैयारियां शुरू हो गई है। नवरात्रि के मौके पर हर जगह गर्वl उत्सव की धूम रहेगी और माहौल धार्मिक बना रहेगा। 15 अक्टूबर यानी आज अमावस्या के मौके पर माता रानी की घट स्थापना होगी और 24 अक्टूबर को रावण दहन के साथ इस पर्व का समापन होगा। इस नवरात्रि के पर्व को देखते हुए इस वर्ष महिलाओं एवं बालिकाओं में उत्साह देखने को मिल रहा है।
मां के आराधना की कुछ खास बातें।
मां अंबे को भेंट करें सुहाग की सामग्री: अक्सर उपासक सुहाग के समान के तैयार पैकेट मां के मंदिर में अर्पित करते हैं सुहाग के समान का नियम यह है कि इसे मां के चरणों में रखकर या मां को भेंट करते हुए ले लिया जाए और किसी सुहागन को भेंट किया जाए इसीलिए इस सामग्री की गुणवत्ता ऐसी होनी चाहिए कि कोई इसका उपयोग कर सके सुहाग का सामान उस दिन मंदिर में ले जाएं जिस दिन उपासना की मान्यता परिवार में हो जो सप्तमी करें वे सप्तमी के दिन, जो अष्टमी मानने वाले उसे अष्टमी के दिन और नवमी मानने वाले उपासक नवमी के दिन यह भेंट मां को अर्पित करें।

मां के द्वारे , हरे हरे जवारे: नवरात्रि में जो बोनी और 9 दिन बाद उन्हें विसर्जित करने की प्रथा है। जवारे बोना देवी की उपासना के साथ-साथ मनुष्य की प्रकृति के प्रति समर्पण का प्रतीक भी मानl जातl है नवरात्र में जबारो के साथ की जाने वाली घट स्थापना की रीति का अपना-अपना अलग महत्व और विधान होता है। बता दे की सृष्टि के प्रारंभ में स्वयं ब्रह्मा जी द्वारा इसकी उत्पत्ति की गई थी अनाज में भी पहले इसे ही उगाया गया था। इसी कारण इसे अन्नपूर्णा भी कहा जाता है और हर शुभ कार्य में शुभ समृद्धि की कामना के साथ जवारे बोए जाते हैं।

देवी पूजन में अखंड ज्योति का है महत्व: नवरात्रि शुरू होने पर ही कुछ लोग अपने घरों में और मंदिरों में अखंड ज्योत प्रज्वलित करते हैं देवी पूजन में अखंड ज्योत का अलग ही महत्व होता है। लोग नवरात्रि शुरू होने के पहले दिन से समापन होने तक यह जोत जलाकर रखते हैं। लेकिन इससे जुड़ी कुछ सावधानियां भी ध्यान में रखनी चाहिए। अखंड दीप की बाती को ठीक करते समय उसके खंडित होने का भय हो तो एक छोटा दीपक प्रज्वलित करके साथ में रखें भूल बस जोत खंडित हो भी जाए तो उसे तुरंत छोटे दीपक से पुनः प्रचलित कर लें इससे ज्योति को खंडित नहीं माना जाता और कोई दोष नहीं लगता। जोत को लेकर आशंकित न हो, देवी और ज्वारों का नियमित पूजन प्रातः 9:00 बजे तक संपूर्ण कर लेना चाहिए।

नवरात्रि समापन दिन और विसर्जन के दिन रखें यह ध्यान: विसर्जन के दिन नित्य पूजन अर्चन और भोग इत्यादि से निवृत होने के बाद शुभ मुहूर्त देखकर सबसे पहले घट को स्थान से विस्थापित कर दें फिर हाथों में उठाकर आम के एक पत्ते की सहायता से सारे घर में इसके जल का छिड़काव कर दें और विशेष बचे हुए जल को पौधों में डाल दें तत पश्चात देवी की प्रतिमा तस्वीर जवारो और गौरी गणेश को उठाकर पूरे घर का भ्रमण कराए जिससे घर के हर कोने में इनकी उजली दृष्टि पड़ सके।
- * ध्यान रखने योग्य बातें:
- * घर में चूहा होने की स्थिति में जवारो का ध्यान रखें चूहे जड़ों को खाकर कुतरकर नष्ट कर देते हैं इसलिए जवारे बोने से पूर्व ही इस समस्या का प्रबंधन कर लें।
- * एक बार स्थापना के पश्चात जवारो और कलश की स्थापना परिवर्तित नहीं की जा सकती इसीलिए स्थापना के स्थान का चयन सोच समझकर करें।
- * अखंड ज्योति के अतिरिक्त एक दीपक देवी की बैठक के समक्ष रखें और एक आरती के लिए अलग से तैयार करें।
