दीपावली का त्यौहार जैसे ही पास आने वाला होता है लोगों के मन में उत्साह और उमंग भर जाता है।लोग कई दिनों पहले ही दीवाली की तैयारियां करने लगते हैं। दिवाली का त्यौहार खुशियां अपनापन और सम्मान के साथ-साथ समृद्धि भी लाता है भारतीय वैदिक परंपरा में लक्ष्मी का अर्थ सिर्फ धन नहीं है। धन से मिलने वाली खुशी भी है। ऋग्वेद में लक्ष्मी जी को श्री कहा गया है श्री सूक्त में लक्ष्मी की उपासना है। दीपावली पर लक्ष्मी की धूमधाम से और श्रद्धा से गणपति जी और सरस्वती जी के साथ पूजा की जाती है। और सुख समृद्धि की कामना करते हैं।
दिवाली के त्यौहार के लिए कई लोगों के मन में एक मिथक बना हुआ है की दिवाली का त्योहार केवल श्री राम जी के अयोध्या वापस लौटने की खुशी में मनाया जाता है जबकि इसके पीछे कई और कारण है जिसकी वजह से दिवाली का त्यौहार मनाया जाता है और इस त्यौहार पर मां लक्ष्मी, सरस्वती जी और गणेश जी की पूजा अर्चना की जाती है और सुख ,समृद्धि की गुहार लगाई जाती है।
दीपावली का सीधा संबंध है “समुद्र मंथन” से:-
दीपावली का त्यौहार बड़ी ही धूमधाम से मनाए जाने का सीधा संबंध समुद्र मंथन से है सतयुग में समुद्र मंथन होने पर मंथन से निकली गई वस्तुओं और भगवानों से भी माना जाता है। सतयुग में जब सभी देवी देवता मनुष्य आदि श्रीहीन हो गए थे तब समुद्र मंथन में एक के बाद एक वस्तुएं निकाली और साथ ही भगवान धन्वंतरि और लक्ष्मी जी भी प्रकट हुई तभी से दीपावली मनाने की प्रथा शुरू हुई।
धनतेरस को भगवान धन्वंतरि अमृत कलश लेकर समुद्र मंथन से बाहर आए। वही इसके दो दिन बाद मां लक्ष्मी भी समुद्र मंथन से प्रकट हुई इसके उपलक्ष्य में मां लक्ष्मी की पूजा विधि विधान से दीपावली के दिन भगवान गणेश और माता सरस्वती के साथ की जाती है। और माता लक्ष्मी को अपने घरों में बड़े ही सम्मान के साथ बुलाया जाता है जिससे कि घरों में सुख, समृद्धि और धन आए।
समुद्र मंथन से निकले कई शुभता के प्रतीक:-
जब सतयुग में समुद्र मंथन हुआ तब समुद्र मंथन से कई समृद्धि के खास प्रतीक भी निकले जिनके बिना दिवाली पर लक्ष्मी जी का पूजन अधूरा माना जाता है। भारतीय संस्कृति में लक्ष्मी जी को श्री का कहा जाता है श्री यानी शुभता और लक्ष्मी, इसीलिए दिवाली में लक्ष्मी पूजन के साथ शुभता के प्रतीक की भी पूजा होती है। अधिकतर प्रतीक समुद्र मंथन से निकले हैं इसीलिए दिवाली के पर्व पर समुद्र मंथन का खास महत्व होता है। कमल, कलश, हाथी , शंख ,पारिजात ,चक्र, श्री यंत्र सहित कई ऐसी चीज हैं जिनका दिवाली पर पूजन में खास महत्व है यह शुभता के प्रतीक है यह चीज समुद्र मंथन से सतयुग में लक्ष्मी के साथ प्रकट हुई थी।
पूजन विधि एवं सामग्रियां:-
हर व्यक्ति यथासंभव प्रयास करता है कि कुछ ऐसे उपाय या विधान विधि अपना सके जिससे ऐसी पूजन कर सके जिससे मां लक्ष्मी का उस पर सदा फलदायक आशीर्वाद व कृपा बनी रहे।
वैसे तो सभी अपनी तरह से और अपनी पूरी श्रद्धा से दीपावली का विधि विधान से पूजा करते आए हैं और भगवान को खुश करते आए हैं इसी के साथ कुछ ध्यान रखने योग्य बातें ऐसी होती हैं जो अगर हम अपनी पूजा में जोड़ ले तो मां लक्ष्मी को और अधिक प्रसन्न किया जा सकता है।
- सभी सामग्रियों को व्यवस्थित करके पूजा स्थान पर रख लेना चाहिए दीवार पर लक्ष्मी जी का पना लगाए उसके सामने चौकी रखें।
- चौकी पर हल्दी कुमकुम से स्वास्तिक बनाकर अक्षत रखकर उस पर कोरा लाल कपड़ा बिछाए।
- चौकी पर गणेश रूप में गोल सुपारी सरस्वती के रूप में कमल और लक्ष्मी जी के रूप में कमल या कोई भी लाल फूल रखें फूल के पास एक सिक्का रखें इस सिक्के को पूजन उपरांत संभाल कर रखना है खर्च नहीं करना है यह समृद्धि में वृद्धि का परिचायक है।
- इस त्यौहार के मौके पर लोग लक्ष्मी जी, गणपति जी और सरस्वती जी की मूर्तियां भी लाकर पूजा करते हैं इन्हें आप अच्छी तरह व्यवस्थित कर कर रख ले पूजा का थाल सजा लें जिसमें हल्दी कुंकुम अक्षत, पुष्प, श्रीफल ,सिक्का व मेहंदी रखें ।
- पूजन सामग्री को जल से शुद्ध करें।
- और एक के बाद एक विधि विधान से पूजा करें हल्दी कुमकुम पुष्प चावल जल से भी पूजा करें। वैसे तो पूजा विधियां कई तरह की होती हैं लेकिन पंचोपचार विधि में ज्यादा विधि विधान नहीं होते यह विधि छोटी होने के साथ निर्दोष और अधिक सफलता देने वाली होती है। षडशपचार विधि में जिस तरह कलश आदि लगाया जाता है और बहुत ज्यादा विधि विधान किए जाते हैं लेकिन इस विधि में ऐसा नहीं है।
- पंचोपचार विधि में देवी की पूजन सामग्री से पूजा, पुष्प अर्पण, धूप, नैवैध अर्पण और आरती करनी होती है इस पूजा में पंडित या देवज्ञ की आवश्यकता नहीं होती।
- अतः पंचोपचार विधि से पूजा करें ।
- दीपावली के दिन अखंड ज्योति भी जलानी चाहिए अतः एक दिया ऐसा जलाएं जो रात भर जलना चाहिए।
5 दिन का पर वी होता है दीपावली धनतेरस से होती है शुरुआत:
दीपावली का त्योहार 5 दिन का होता है 5 दिन का यह पर्व दिवाली धनतेरस से शुरू किया जाता है। भारतीय कला की गणना सतयुग से शुरू होती है इस युग में पहली बार दिवाली पर्व मनाया गया था इसके बाद आए त्रेता और द्वापर युग में राम व कृष्ण के साथ इसमें नई घटनाएं भी जुड़ती चली गई और यह 5 दिन का पर्व बन गया। यह हमें जानना जरूरी होगा कि हमारे सनातन धर्म में दिवाली का किस तरह महत्व है और इसके पीछे क्या-क्या घटनाएं जुड़ी हुई है जिनकी वजह से यह पर्व 5 दिन का मनाया जाता है।
- पहले दिन की शुरुआत धनतेरस से होती है ऐसी मान्यता है की सबसे पहले सतयुग में कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी के दिन समुद्र मंथन से भगवान धन्वंतरि प्रकट हुए थे जिनके हाथों में अमृत कलश था तब से धनतेरस का पर्व मनाया जाता है भगवान धन्वंतरि को आयुर्वेद का पहला वेध भी कहा जाता है और इन्हे स्वास्थ्य से जोड़ा गया है इसीलिए लोग धनतेरस के दिन कुबेर देवता की तो पूजा करते ही है साथ में भगवान धन्वंतरि की पूजा करके भी अपने अच्छे स्वास्थ्य की कामना करते हैं।
- दिवाली का दूसरा दिन यानी नरक चौदस भी कहा जाता है और छोटी दीपावली भी कहा जाता है द्वापर युग में इसी कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी के दिन भगवान कृष्ण ने नरकासुर का वध किया था तब पर्व में शामिल हुआ नरक चतुर्दशी यानी छोटी दीपावली जो दिवाली से एक दिन पहले आती है। इस दिन यमराज के लिए भी दीप जलाया जाता है और उनसे अपने परिवार के लिए लंबी आयु की कामना की जाती है।
- दीपावली के पर्व का तीसरा दिन यानी दिवाली इस दिन सतयुग में सबसे पहले कार्तिक माह की अमावस्या को समुद्र मंथन के द्वारा लक्ष्मी जी प्रकट हुई थी इसीलिए इस दिन भगवान विष्णु और लक्ष्मी जी का विवाह हुआ। तब दिवाली मनाई गई बाद में त्रेता युग में इसी दिन भगवान राम वनवास काट कर अयोध्या वापस लौटे थे इसीलिए लोगों ने उनके लौटने की खुशी में धूमधाम से दीप उत्सव मनाया और खुशियां मनाएं इसी के साथ यह घटना भी दिवाली में जुड़ गई।
- चौथा दिन दिवाली के दूसरा दिन द्वापर युग में दिवाली के अगले दिन प्रतिपदा पर भगवान कृष्ण जी ने गोवर्धन पर्वत की पूजा की थी तब से यह दिन भी बना 5 दिन के पर्व का हिस्सा। इस दिन गोवर्धन पर्वत की पूजा की जाती है और श्री कृष्ण की भी पूजा की जाती है।
- वही दिवाली का पांचवा दिन यानी “भाई दूज” इस दिन द्वापर युग में श्री कृष्ण नरकासुर को हराने के बाद अपनी बहन सुभद्रा से मिलने गए थे। वहां सतयुग में इसी दिन यमराज भी अपनी बहन यमुना के घर उनके आमंत्रण पर गए थे और यमुना जी ने उनका तिलक लगाकर आदर सत्कार किया था इसीलिए भाई दूज को दीपावली के 5 दिन के पर्व में जोड़ा गया है। इस दिन बहनें अपने भाईयो का आदर सत्कार कर उनका तिलक करती है।
